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मंगलवार, 26 मई 2015

ट्विटर के गलियारे से.…

इस पोस्ट के द्वारा ट्विटर पे लिखे गए अपने कुछ सूक्ष्म-काव्य आप लोगो के साथ साँझा कर रहा हूँ। बहुत सारे मित्रों ने, जो कि ट्विटर पर सक्रिय नहीं हैं, मुझसे आग्रह किया था कि मैं अपने कुछ ट्वीट उनके साथ साँझा करूँ। अपने मित्रों की फरमाइश को ध्यान में रखते हुए ये पोस्ट सभी हिंदी प्रेमियों को समर्पित करता हूँ. आशा है कि आप सभी को पसंद आयेगा।





























































मेरे नवीनतम ट्वीट्स के लिए @simplyhimanshur पर मुझे फॉलो कर सकते हैं, मेरे पुराने ट्वीट्स के संग्रह के लिए आप @himanshuarchive को फॉलो कर सकते हैं। 

रविवार, 25 मई 2014

मेरे अरमानों की बरसात अभी बाकि है

कुछ हसरतें पूरी हुई हैं मेरी , मेरे अरमानों की बरसात अभी बाकि है
अभी से महफ़िल ख़त्म मान ली तुमने , मेरी बात अभी बाकि है

छोड़कर चल दिए अभी से तुम मेरा साथ
अभी तो मेरे हमसफ़र सारी रात बाकी है
मेरे अरमानों की बरसात अभी बाकि है

ये चंद हसी लम्हें जो गुजारें हैं तारों की छाव में
ये तो कुछ भी नहीं , मेरे इश्क की सोगात अभी बाकि है
मेरे अरमानों की बरसात अभी बाकि है

तुम जो कह दो तो गुनगुनाता जाऊ यूँ हि मै सदा
सुने हैं अब तक जो तुमने अधूरे से, मेरे जज्बात अभी बाकि हैं
मेरे अरमानों की बरसात अभी बाकि है

दूर कहीं चले इस धरती से, इस अम्बर से हम दोनों
कुछ झूठे से हि सही ,मेरे ख़यालात अभी बाकि हैं
मेरे अरमानों की बरसात अभी बाकि है

चंद लफ्जो में क्या बयाँ करू एहसास इस दिल-ए-आवारा के
कुछ लिखे तो हैं मैंने तेरे नाम से, अल्फाज़ मेरे अभी बाकि है
मेरे अरमानों की बरसात अभी बाकि है

तुम कहो इसे दीवानगी मेरी या पागलपन कहो
अधूरी सी है कहानी ये मेरी तुम्हारी, एहसास मेरे अभी बाकि हैं
मेरे अरमानों की बरसात अभी बाकि है



  

सोमवार, 12 मई 2014

ये बाबरी सी बारिशें और तेरी यादों का सैलाब

ये बाबरी सी बारिशें और तेरी यादों का सैलाब
ज़िन्दगी मेरी जैसे इन्हीं लम्हों का नाम है
ख्याल तेरी चाहतो के, तेरा मेरे साथ होने का एहसास
ज़िन्दगी मेरी जैसे इन्हीं लम्हों का नाम है

मेरे लम्हें, मेरे पल; मेरे आज, मेरे कल
मेरे किस्से,मेरी बातें; मेरे दिन, मेरी रातें
तुझसे शरू हर नज्म मेरी तुझपे ख़त्म हर कहानी मेरी
तेरी बाहों में दिन मेरे, तेरे तस्सवुर में शाम है
ज़िन्दगी मेरी जैसे इन्हीं लम्हों का नाम है

वो नंगे पावँ तेरा चले आना, चुपके से मुझसे से मिलना
वो हवा में तेरी लटों का लहराना, वो तेरे लबो का खिलना
नशा है मुझपे ये तेरे इश्क का, पिया मैंने तेरी चाहत का जाम है
ज़िन्दगी मेरी जैसे इन्हीं लम्हों का नाम है

चाहना तुझको बेपन्हा है अब मजहब मेरा
`तेरा नाम क्या है, है ये रब मेरा
हुआ है काफ़िर दिल मेरा तेरी मुहब्बत में
इबादत तेरी करना बस अब मेरा काम है
ज़िन्दगी मेरी जैसे इन्हीं लम्हों का नाम है

ये बाबरी सी बारिशें और तेरी यादों का सैलाब
ज़िन्दगी मेरी जैसे इन्हीं लम्हों का नाम है


सोमवार, 4 नवंबर 2013

ये तुम हो या तुम्हारे होने का अहसास

हवाओं  ने छेड़े हैं आज फिर से मधुर गान
चाँदनी से भरा है  सारा आसमान...
ये जो मौसम  ने बदली है करवट आज
ये तुम हो या तुम्हारे होने का अहसास।।।।

करने लगा है दिल मेरा खुद से खुद ही बात
मिली  है जैसे बिन माँगे खुशियों कि सौगात...
बदला है समां ये , हुई जैसे सावन की पहली बरसात
ये तुम हो या तुम्हारे होने का अहसास।।।

बहके -बहके से कुछ कदम हैं मेरे
बावरे से कुछ स्वप्न हुए हैं मेरे
नहीं हैं  बस में मेरे , अब मेरे जज़बात
ये तुम हो या तुम्हारे होने का अहसास।।।

देखता हूँ जिधर भी फिजायें बदली सी हैं
मेरी आरजुएं आज कुछ पगली सी हैं
कैसे न माने मेरा दिल कि कुछ तो है बात
ये तुम हो या तुम्हारे होने का अहसास।।।

यूँ  जो कभी भी चली आती हो तुम
मेरे होने का एक नया एहसास लाती हो तुम
कातिल तो हैं पर क्या कमाल हैं तुम्हारे ये अंदाज़
ये तुम हो या तुम्हारे होने का अहसास।।।

आज पूरी सी दुआएं लगती हैं मुझे अपनी
बेगानी ये दुनिया लगती  हैं मुझे अपनी
ज़माने भर की  दौलत हो जैसे आज इस फ़क़ीर के पास
ये तुम हो या तुम्हारे होने का अहसास।।।




बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

...शब्द तुम्हारे हैं

देखें हैं मेरे नैनों ने जो ...स्वप्न तुम्हारे हैं
लिखती है जो कलम मेरी...शब्द तुम्हारे हैं

सत्य है कि मेरा अस्तित्व है तुमसे
जीवन मेरा बंधा है तुमसे
क्या हूँ मैं तुम्हरे बिन प्रिये
जियें हैं मैंने जो अब तक ...पल तुम्हारे हैं
लिखती है जो कलम मेरी...शब्द तुम्हारे हैं

ये संसार क्या जाने प्रेम की बातें
जहाँ तय करतें है भाग्य धर्म और जातें
प्रेम के रंग में रंगा हूँ मैं
मेरे ह्रदय से ना छूटे...ये रंग तुम्हारे हैं
लिखती है जो कलम मेरी...शब्द तुम्हारे हैं

कभी बनता हूँ मैं, कभी मिटता हूँ
कभी गिरता हूँ मैं, कभी संभलता हूँ
तुम्हारी स्म्रतियो का लिए सहारा
बढ़ा हूँ जिस पथ पर ...उस पर पदचिन्ह तुम्हारे हैं
लिखती है जो कलम मेरी...शब्द तुम्हारे हैं

कभी हारा हूँ मैं जीवनरण में, कभी टूटा हूँ
कभी आगे बढ़ा हूँ, कभी पीछे छूटा हूँ
कभी जो अंधियारी रात आई है
मेरे जीवन मे आए जो...सवेरे तुम्हारे हैं
लिखती है जो कलम मेरी...शब्द तुम्हारे हैं

देखें हैं मेरे नैनों ने जो ...स्वप्न तुम्हारे हैं
लिखती है जो कलम मेरी...शब्द तुम्हारे हैं









शनिवार, 8 जून 2013

तो बात कुछ और ही होती ...

जिंदगी हसीन है  तेरे बिन भी  यूँ तो
तू होती इसमें शामिल तो बात कुछ और ही होती ...


जागता हूँ मै ,सोता हूँ मैं
हँसता हूँ मैं ,रोता हूँ मैं
हाथ थामे ज़िन्दगी का  चलता हूँ मैं
साथ ग़र कुछ कदम तुम भी चलती तो बात कुछ और ही होती ...


टूटता हूँ मैं,संभालता हूँ मैं
गिरता हूँ मैं,उठता हूँ मैं
वक़्त के साथ कभी कुछ बदलता हूँ मैं
बदलती तुम भी साथ मेरे तो बात कुछ और ही होती ...

बढ़ता हूँ मैं ,थमता हूँ मैं
दौड़ता हूँ कभी ,कभी रुकता हूँ मैं
खोता हूँ कभी खुद को तेरी यादों के आगोश मे
खोती  कभी तू  खुद को मेरे लिए तो बात कुछ और ही होती ...


यूँ तो मंजिल  तेरे बगैर भी जाएगी मुझे
साथ गर राह पर तेरा मिल जाता तो बात कुछ और ही होती ...


                      "   तू जो कहें  कविता एक लिखने को ,मैं किताब लिख दूँ 
                           तू पूछे जो हसरत मेरी ,मैं अपने जज्बात लिख दूँ  "


मंगलवार, 12 मार्च 2013

उड़ चला गगन में ...


मन  परिंदा  फिर  उड़  चला  गगन  में ...
पंख खोले  ,कुछ  ना  बोले 
सपनो  से  मिलने  फिर  उड़  चला  गगन  में ….

ना  सीमाए  जाने  ना  बन्दिशें  माने 
छोड़  पीछे  लघु  घरोंदें, उड़  चला  गगन  में …

कुछ  रिश्तें  जो  बांधें  थे उड़ान को 
अनवरस  हि  उठे  उफान को 
तोड़  मोह  बंधन  मिथ्या, उड़  चला  गगन में…

ना  हार  अब  कोई  ना  जीत  कोई 
छोड़  भ्रम  संसार  के, उड़  चला  गगन में...

ना  रोके अब कोई न टोके अब कोई  
अब जो उड़ा है उड़ता ही  जाएगा  
फेंक दूर लोभ स्वर्ण पिंजरे के उड़ चला गगन में…


सोमवार, 14 जनवरी 2013

कहाँ

कहाँ खोजूँ वो सुकून के पल जो गुम गएँ हैं तेरी चाहत में कहीं
कहाँ  पाऊ वो ख़ुदा जो खो गया है तेरी इबादत में कहीं ...

 हैं तुझको  गिले बहुत ,कुछ मुझको भी तो हैं
कहाँ ढूँढु वो शिकवे मेरे जो खो गएँ हैं तेरी शिकायत में कहीं .... 

रविवार, 21 अक्टूबर 2012

जानता नहीं

है ये कैसा सफ़र ...कि जानता नही कि  चल रहा हूँ या गुजर रहा हूँ
है ये कैसी अजब सी लगन ...कि जानता नहीं कि जल रहा  हूँ  या बुझ रहा  हूँ

साथ चलने के  लिए ज़माने के साथ
छूटें हैं पीछे कई मेरे हाथ
भीड़  हैं जहाँ की मेरे चारों ओर
ढूँढता हूँ कोई जाना -पहचाना सा
चेहरा इसमें यूँही ...
है ये कैसी उलझन ...कि जानता नहीं कि पा रहा हूँ या खुद को खो रहा हूँ

दौड़ में जिंदगी की  बड़ी दूर निकल आया हूँ
कुछ था सचमुच मेरा अपना कही खो आया हूँ
पाया भी है कुछ मैंने पर
इसमें कुछ कमी सी है ...
है ये कैसी खलिश ...कि जानता नहीं कि हँस रहा हूँ या रो रहा हूँ ...

मंगलवार, 15 मई 2012

तुझसे खफा होकर जाऊ कहाँ

मैं तुझसे खफा होकर जाऊ कहाँ ए खुदा 
ये जहां तेरा है ये कायनात भी तेरी है...

खोजू तुझे  क्यूँ पत्थर की इमारतों में 
ये नजारें भी तेरे हैं ये नज़र भी तेरी है...

क्यूँ बांधू तेरी इबादत को वक़्त के दायरे में 
ये शाम भी तेरी है ये सहर भी तेरी है....




रविवार, 29 अप्रैल 2012

मेरी ख्वाहिशें ,उसकी इनायतें

                                                                                  (image:123rf.com)
                                      "मेरी ख्वाहिशों  की जो कोई हद नहीं तो मेरा कसूर क्या है
                                        तू ही बता ऐ खुदा तेरी इनायतों का दायरा क्या है......"


शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

कहा था तुमने

भुला न पाओगे मेरी यादों को, कहा था तुमने
वास्ता अपनी चाहत का दिया था तुमने
ना समझ सका तुम्हारे उन एहसासों को
जिनके हर अंश पर मेरा नाम लिखा था तुमने

खोकर तुम्हे ये एहसास हुआ
जैसे खुद को ही कहीं खो बैठा हूँ मैं 
ख़ामोशी जब कभी घेरेगी तुम्हे
दिल में कसक आँखों में मेरा चेहरा होगा, कहा था तुमने

दूर तुम क्या गयी मुझसे जैसे संसार मेरा कहीं खो गया
जो था मेरा मानो वो किसी और का हो गया
बहुत पछताओगे मुह मोड़ के जाते हो अभी
कुछ कहना कभी चाहोगें तो कह ना पाओगे, कहा था तुमने

हुआ था बावरा दुनिया की चकाचोंध में
अब समझा प्यार बिन कहाँ कुछ रखा है दुनिया में
जिसके लिए छोड़ के जाते हो ,एक दिन जब वो ही ठुकराएगा
तो ख्याल सिर्फ मेरा आयेगा, कहा था तुमने

अब पल-पल तड़पता हूँ दिल पे बोझ लिए
अफ़सोस भी करता हूँ अपने किये  पे
एक बार जो चली गयी मुड़ के
वापस ना आऊँगी, कहा था तुमने

कहाँ जाऊ,क्या करूँ, कुछ समझ नहीं आता है 
हर पल तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा सामने आता है
जब कभी  मुश्किल  आए, आँखें बंद करके
 मेरा नाम पुकारना ,पास मुझे पाओगे ,कहा था तुमने







बुधवार, 4 अप्रैल 2012

आखिर क्यूँ

कहीं दूर किसी अमीरजादे की शादी
में बजते डी जे  की आवाज में
पास में भूखे पेट रोते-चिल्लाते गरीब
के बच्चे की आवाज दब जाती है...आखिर क्यूँ


क्यूँ दिन के उजाले में किसी युवा शहीद  की
बेवा की तन्हा रातों  की पुकार चुप हो जाती है ...आखिर क्यूँ


क्यूँ होता है ऐसा कि
अन्नदाता जो है खुद ही भूखा तड़पता 
मौत को गले लगा लेता है
जो मेहनत करता है वो ही जीता है मरते-मरते...आखिर क्यूँ

क्यूँ कोई बन बैठता है सपनो का सौदागर
और किसी को सपने देखने का हक भी नहीं मिल पता है...आखिर क्यूँ

कोई बना लेता है
सोने के बड़े-बड़े बंगलें यहाँ
कोई जिंदगी बिता देता है 
एक छोटी सी छत के इंतिजार में...आखिर क्यूँ

किसी की आवाज को सुनने को दुनिया
पलकें बिछाए रहती है
किसी मजबूर की आवाज कोई एक पल को भी नहीं सुनाता...आखिर क्यूँ


कोई पल में बन बैठता है जहाँ का मालिक यहाँ
कोई अपनी ही दो गज जमीन पाने को
न्याय के घर में दम तोड़ देता है...आखिर क्यूँ










मंगलवार, 27 मार्च 2012

मन बावरा , बावरी सी हसरतें

मन बावरा ,बावरी सी हसरतें
दूर दूर तक जाये बाहें पसराये
यूँ ही हर पल करे कसरतें
मन बावरा , बावरी सी हसरतें


कभी कागज की नाव  बनाकर सपने साकार करे
कभी यूँ ही  बिन छुए खयाली चित्रों में रंग भरे
कभी कही रुके पल भर को
कभी हवाओं से बातें  करे
कभी उन्माद में उछला फिरे
कभी किसी सुन्दर ख्याल में
रात भर बदले करवटें
मन बावरा, बावरी सी हसरतें


कभी हो उदास यूँ ही गुम सुम सा हो जाता है
कभी किसी दूसरे की खुशियों की खातिर खुद को भूल जाता है
बजे कभी दूर जो मीठी सी धुन
सुरों पे खुद ही झूम जाता है
तो कभी अपनी ही धुन में खोकर
दुनिया की सुध बुध खो जाता है
कभी यूँ  ही खुद से खुद की कर बैठता है शिकायतें
मन बावरा, बावरी सी हसरतें

कभी प्रेम में पागल  हुआ दर दर घूमता है
कभी दम से अपने सफलता के शिखर चूमता है\
कभी कुछ कर गुजने को हर बाधा से जूझता है
बच्चे सा कभी खुद से रूठता भी है
फिर सोच के कुछ खुद को मनाता भी है
कभी गुनगुनाता है बोल सुने-सुने
कभी कहता है अनकही  सी कहावतें
मन बावरा, बावरी सी हसरतें

कभी मांगता है मन्नतें उनके लिए जो इसके अपने नहीं
कभी अपनों से बैर रखता है यूँ ही
जो घट चूका है न जाने कब का कभी उसमे  ही जीता है
याद करता है किसी मीत को घूंट आसुओ के पीता है
कभी देखकर उदास किसी को खुद भी उदास हो जाता है
कभी बनके सबब  किसी की मुस्कराहट का, खास बन जाता है
कभी सिखाता है दूसरो को जीने का ढंग
कभी खुद ही जीता है मरते मरते
मन बावरा, बावरी सी हसरतें


कभी जाना चाहता है दूर जहाँ कोई ना हो
कभी चाहता है पास हर कोई हो
बैठे -बैठे अजीब  सी उलझनों में डालता है
पर उलझनों से उबारता भी है
बस इसकी इन्हीं आदतों को सोच कर इसको बार-बार देता हूँ मै रियायतें
मन बावरा, बावरी सी हसरतें....


Himanshu Rajput











शनिवार, 17 मार्च 2012

न जाने क्यूँ...

दिन भर तमाम चेहरे देखता हूँ भले हि मैं
रात को महज एक तेरा चेहरा दिखाई देता है न जाने क्यूँ...

जो कभी एक झलक चाँद की पाना चाहूँ तो
चाँद में भी तेरा चेहरा नजर आता है न जाने क्यूँ...

गुनगुनाता हूँ कोई नगमा यूँ ही कभी जो
लगता है जैसे कहीं दूर सुन रही है तू न जाने क्यूँ..

दुआ में हाथ उठता जब कभी कुछ मांगने को खुदा से
बस तेरा ही नाम याद
आता है न जाने क्यूँ...

खयालो
से तेरे रोशन है ये मेरा जहाँ
अपने ख्वाबो में भी दीदार तेरा पाता हूँ न जाने क्यूँ...

कोई इसे
मेरा पागलपन कहे या दीवानापन 
सोचू तुझे तो दर्द में भी मुस्कुरा देता हूँ न जाने क्यूँ...

कभी इत्तेफाकन कहीं तू मिल जाये मुझे जो
नजरें खुद हि झुक
जाती है जैसे सजदे में हो न जाने क्यूँ...

अब दुनिया इसे प्यार कहे या मोहब्बत
मेरे लिए तो ये खुदाई है मेरे खुदा न जाने क्यूँ...

सोमवार, 12 मार्च 2012

कुछ यूँ समां गई है मुझमे वो...

कुछ यूँ समां गई है मुझमे वो
की अब अपने हि होने का एहसास नहीं होता
ना उसकी यादों के बिन रात होती है
ना उसे सोचे बगैर मेरा दिन हि होता

यादें उसकी जी भरके आती हैं
कहीं भी चला जाऊं मैं ख्याल उसका एक पल को नहीं जाता
तपती धूप हो या रिमझिम बरसता सावन 
साया सर से उसकी चाहत का कभी नहीं जाता


अकेला कही खड़ा हूँ या लाखो की भीड़ में
अक्स आँखों से उसका ओझल नहीं होता
खुद भी चली आओ ऐ मेरी हमदम मेरी वीरान जिंदगी में
फासलों का ये  मौसम अब और सहा नहीं जाता...

शुक्रवार, 2 मार्च 2012

कुछ तो बात है

आज फिर से चली है  पुरवाई
आज फिर याद तुम्हारी आई
आज फिर अहसास अजीब सा दिल में उठा है...कुछ तो बात है


आज फिर दिल में उठा उमंगो का तूफ़ान
आज फिर मारा मेरी चाहतो ने उफान
आज फिर एक प्यारा सा कांटा चुभा है...कुछ तो बात है


ये हवाएं जरुर तुझे छूके आईं होगी
एक पल के लिए ही सही याद तुझे भी मेरी आईं होगी
कुछ उम्मीद आज फिर से जगी है...कुछ तो बात है


लाख छुपाये तू जज्बात ज़माने से
मैं जानता तेरे अनकहे एहसासों को
इन एहसासों में आज फिर मेरा दिल रमा है...कुछ तो बात है

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

तुम्हारे लिए

आज फिर रोया है ये दिल
रोया है ये दिल आज फिर तुम्हारे लिए


 लाख तूफां झेले हैं मेरी कश्ती ने यूँ तो
हवाएं कुछ ऐसे चली हैं अबके कि
वेदना अजीब सी  उठी है तुम्हारे लिए

यूँ तो यकीं नहीं ख्वाबो ख्यालो कि दुनिया में मुझे
न जाने क्यूँ  सपने बुनना  अच्छा लगता है  तुम्हारे लिए


वो कोई और होंगे जो जीते होंगे दौलत शोहरत  की खातिर
मेरी तो हर साँस चली है तुम्हारे लिए


अपने लिए कब कुछ माँगा है मैंने उस खुदा से
जब उठे हैं ये हाथ दुआ में उठे हैं तुम्हारे लिए


गलत हैं वो लोग जो जोड़ते मोहब्बत को जिस्म की बंदिशों में
मेरा इश्क तो रूहानी हुआ है तुम्हारे लिए

लाख वजहे हो सकती है इस जिंदगी को जीने वैसे तो
ना जाने क्यूँ मैंने अपना हर पल जिया है तुम्हारे लिए

तुम दूर रहो या पास , मुझे चाहो या नहीं क्या फर्क पड़ता है
मेरी हर धड़कन धड़कती है महज तुम्हारे लिए

काश ये मेरी जिंदगी भी एक  मधुर कविता होती
मेरी कविता का हर लफ्ज  होता तुम्हारे लिए


तुम यकीं करो या न करो
आज भी ये अंशु जीता है सिर्फ तुम्हारे लिए

*HimANSHU RAJput*