शनिवार, 17 मार्च 2012

न जाने क्यूँ...

दिन भर तमाम चेहरे देखता हूँ भले हि मैं
रात को महज एक तेरा चेहरा दिखाई देता है न जाने क्यूँ...

जो कभी एक झलक चाँद की पाना चाहूँ तो
चाँद में भी तेरा चेहरा नजर आता है न जाने क्यूँ...

गुनगुनाता हूँ कोई नगमा यूँ ही कभी जो
लगता है जैसे कहीं दूर सुन रही है तू न जाने क्यूँ..

दुआ में हाथ उठता जब कभी कुछ मांगने को खुदा से
बस तेरा ही नाम याद
आता है न जाने क्यूँ...

खयालो
से तेरे रोशन है ये मेरा जहाँ
अपने ख्वाबो में भी दीदार तेरा पाता हूँ न जाने क्यूँ...

कोई इसे
मेरा पागलपन कहे या दीवानापन 
सोचू तुझे तो दर्द में भी मुस्कुरा देता हूँ न जाने क्यूँ...

कभी इत्तेफाकन कहीं तू मिल जाये मुझे जो
नजरें खुद हि झुक
जाती है जैसे सजदे में हो न जाने क्यूँ...

अब दुनिया इसे प्यार कहे या मोहब्बत
मेरे लिए तो ये खुदाई है मेरे खुदा न जाने क्यूँ...

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